संकष्टमोचन स्तोत्र | Sankashtmochan Stotra |

 

संकष्टमोचन स्तोत्र

संकष्टमोचन स्तोत्र 



सिन्दूरपूररुचिरो बलवीर्यसिन्धुर्बुद्धिप्रवाहनिधिरद्भुतवैभवश्रीः |
दीनार्तिदावदहनो वरदो वरेण्यः संकष्टमोचनविभुस्तनुतां शुभं नः || १ ||
जो सिन्दूर स्नानसे सुन्दर देहयुक्त, बल वीर्यके सागर, 
बुद्धि प्रवाहके आकरऔर अद्भुत ऐश्वर्यके धाम हैं,
जो दिनोंके दुःखोंका नाश करनेके लिये दारुण दावानलके समान हैं
तथा जो वरदान तत्पर, सर्वकामपूरक, संकटघटाविदारक और सर्वव्यापी हैं,
वे संकटमोचन प्रभु हम लोगोंके लिये मङ्गलकारी हों || १ ||


सोत्साहलद्धितमहार्णवपौरुषश्रीर्लङ्कापुरीप्रदहनप्रथितप्रभावः |
घोराहवप्रमथितारिचमूप्रवीरः प्राभञ्जनिर्जयति मर्कटसार्वभौमः || २ ||
उन वानरराज चक्रवर्तीकी जय हो,
जो उत्साहपूर्वक महासिन्धुको लाँघ गये,
जिनकी पुरुषार्थ लक्ष्मी देदीप्यमान है,
लंकानगरीके दहनसे जिनकी प्रभाव प्रभा दिग्दिगन्तव्याप्त है और
जो घोर राम रावण युद्धमें शत्रु सेनाका मथन करनेमें महान् वीर तथा
प्रभञ्जन पवनको आनन्द देनेवाले पवनकुमार है || २ ||


द्रोणाचलानयनवर्णितभव्यभूतिः श्रीरामलक्ष्मणसहायकचक्रवर्ती |
काशीस्थदक्षिणविराजितसौधमल्लः श्रीमारुतिर्विजयते भगवान् महेशः || ३ ||
जो संजीवनी के लिये द्रोणागिरी को ही उठा ले गए थे,
जो भव्य सुंदर विभूतिसम्पन्न,
श्रीराम लक्ष्मण के सेवक सहायको में चक्रवर्ती शिरोमणि और 
मल्लवीर काशीपुरीके दक्षिणभाग स्थिर दिव्यभावन में विराजमान है 
ऐसे महेश रुद्रावतार भगवान् मारुतिकी जय हो || ३ || 


नूनं स्मृतोऽपि दयते भजतां कपीन्द्रः सम्पूजितो दिशति वाञ्छितसिद्धिवृद्धिम् |
सम्मोदकप्रिय उपैति परं प्रहर्ष रामायणश्रवणतः पठतां शरण्यः || ४ ||
जो वानरराज स्मरणमात्र से भक्तोंपर दया करनेवाले है 
विधिपूर्वक सम्पूजित होनेपर सभी मनोरथोकी सुख समृद्धि 
की पूर्ति करनेवाले है | मोदक लड्डू प्रिय अथवा 
भक्तोंको मुदित करनेवाले है | 
रामायण श्रवण से उन्हें परम हर्ष प्राप्त होता है 
और वो पाठको की पूर्णरूप से रक्षाकरनेवाले है | 

श्रीभारतप्रवरयुद्धरथोद्धतश्रीः पार्थैककेतनकरालविशालमूर्तिः |
उच्चैर्घनाघनघटाविकटाट्टहासः श्रीकृष्णपक्षभरणः शरणं ममास्तु || ५ ||
महाभारत के महायुद्धके रथपर जिनकी शोभा समुद्यत हुई थि
प्रुथानन्दन अर्जुनक रथकेतुपर जिनकी विकराल विशालमूर्ति 
विराजमान है,घनघोर मेघ घटाके गंभीर गर्जना के समान 
जिनका विकत अटटहास है ऐसे श्रीकृष्ण पक्ष के 
पोषक मेरे साह्राणदाता हो || ५ ||  

जङ्घालजङ्घ उपमातिविदूरवेगो मुष्टिप्रहारपरिमूर्च्छितराक्षसेन्द्रः |
श्रीरामकीर्तितपराक्रमणोद्धवश्रीः प्राकम्पनिर्विभुरुदञ्चतु भूतये नः || ६ ||
उन विशाल जंघाओं वाले श्रीहनुमानजी का वेग उप्मासे रहित 
अनुपम है,जिनकी मुष्टिके प्रहार से राक्षसराज रावण मूर्छित हो गया था,
जिनके पराक्रम की अद्भुत श्रीका कीर्तन स्वयं श्रीराम करते है,
ऐसे मारुत नंदन श्रीहनुमानजी हमें विभूति प्रदान करे || ६ || 

            सीतार्तिदारुणपटुः प्रबलः प्रतापी श्रीराघवेन्द्रपरिरम्भवरप्रसादः |
वर्णीश्वरः सविधिशिक्षितकालनेमिः पञ्चाननोऽपनयतां  विपदोऽधिदेशम् || ७ ||
सीता के शोकसन्तापके विनाशमे निपुण 
प्रबल प्रतापी श्रीहनुमान भगवान् श्री राघवेंद्रके 
आलिङ्गन रूप दिव्यवर प्रसाद से संपन्न है | 
जो ब्रह्मचारियों के शिरोमणि है तथा कपटसाधु 
कालनेमिको विधिवत शिक्षा देनेवाले है,
वे पञ्चमुख हनुमानजी हमारी रक्षा करे और संकटो को दूर करे || ७ ||

उद्यद्भानुसहस्त्रसंनिभतनुः पीताम्बरालंकृतः
प्रोज्ज्वालानलदीप्यमाननयनो निष्पिष्टरक्षोगणः |
संवर्तोद्यतवारिदोद्धतरवः प्रोच्चैर्गदाविभ्रमः
श्रीमान् मारुतनन्दनः प्रतिदिनं ध्येयो विपद्भञ्जनः || ८ ||
जिनका श्री विग्रह उदीयमान सहस्रसूर्य के सदृश अरुण 
तथा पीतांबर से सुशोभित है,जिनके नेत्र अत्यंत प्रज्वलित 
अग्निके सम्मान उदीप्त है,जो राक्षस समूहोंका विनाश करनेवाले है,
प्रलयकालीन मेघ गर्जना के समान जिनकी घोर गर्जना है,
जिनके मुद्गर का भ्रमण अतिशय दिव्य है, ऐसे शोभा प्रभा 
संवालित श्री हनुमानजी का नित्य ध्यान करना चाहिये || ८ || 

रक्षःपिशाचभयनाशनमामयाधीप्रोच्चैर्ज्वरापहरणं दमनं रिपूणाम् |
सम्पत्तिपुत्रकरणं विजयप्रदानं संकष्टमोचनविभोः स्तवनं नराणाम् || ९ ||
संकट मोचन हनुमानजी प्रभु का स्तवन मानवमात्र के लिये 
राक्षस भय का विनाशक,आधी व्याधि उपाधिया शोक संताप 
ज्वर का प्रशमन करनेवाला,शत्रुओ का दमन करनेवाला 
पुत्र संपत्ति वृद्धिदाता विजय प्रदान करनेवाला है || ९ || 

दारिद्रयदुःखदहनं विजयं विवादे कल्याणसाधनममङ्गलवारणं च |
दाम्पत्यदीर्घसुखसर्वमनोरथाप्तिं श्रीमारुतेः स्तवशतावृतिरातनोति || १० ||
इस स्तुति का सौ बार पाठ करने से दरिद्रता दुःखोंका दहन 
वाद विवाद में विजय प्राप्ति,समस्त कल्याण मंगलो की अवाप्ति 
अमंगलोकि निवृत्ति,गृहस्थ जीवन में सुख शांति समृद्धि 
और मनोरथो की पूर्ति करनेवाला है || १० || 

स्तोत्रं य एतदनुवासरमस्तकामः श्रीमारुतिं समनुचिन्त्य पठेत् सुधीरः |
तस्मै प्रसादसुमुखो वरवानरेन्द्रः साक्षात्कृतो भवति शाश्वतिकः सहायः || ११ ||
जो कोई विवेकशील मनुष्य सकाम निष्काम भावसे श्रीमारुत नंदन का 
चिंतन करते हुये इस स्तोत्र का पाठ करता है उसके समक्ष 
प्रसादसुमुख परम सौभाग्य वानरेंद्र श्रीहनुमानजी साक्षात् प्रकटहोते है और नित्य उसकी रक्षा करते है || ११ || 

संकष्टमोचनस्तोत्रं शंकराचार्यभिक्षुणा |
महेश्वरेण रचितं मारुतेश्चरणेऽर्पितम् || १२ ||
भिक्षु शंकराचार्य श्री महेश्वरकृत इस संकष्टमोचन 
हनुमानजी को यह स्तोत्र समर्पित है || १२ || 

|| अस्तु || 

  
karmkandbyanandpathak

नमस्ते मेरा नाम आनंद कुमार हर्षद भाई पाठक है । मैंने संस्कृत पाठशाला में अभ्यास कर (B.A-M.A) शास्त्री - आचार्य की पदवी प्राप्त की हुईं है । ।। मेरा परिचय ।। आनंद पाठक (आचार्य) ( साहित्याचार्य ) ब्रह्मरत्न अवार्ड विजेता (2015) B.a-M.a ( शास्त्री - आचार्य ) कर्मकांड भूषण - कर्मकांड विशारद ज्योतिष भूषण - ज्योतिष विशारद

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