शैलपुत्री माता की कथा | प्रथम नवरात्र | Shailputri Maa Katha |

शैलपुत्री माता की कथा

शैलपुत्री माता की कथा | प्रथम नवरात्र | Shailputri Maa Katha |
शैलपुत्री कथा 


सर्वप्रथम तो यह आवश्यक है की माँ दुर्गा के प्रथम स्वरुप को शैलपुत्री क्यों कहते है ?
पर्वतो के राजा हिमालय के वहा माँ पार्वती पुत्री रूप में प्रकट हुए इसलिए उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है | 
"शैल यानी पर्वत"


पौराणिक कथा के अनुसार जब प्रजापति दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया तब दक्षराजा ने सभी देवी देवताओ को आमंत्रित किया था अपने अपने यज्ञ का भाग ग्रहण करने के लिए किन्तु सभी देवताओ को आमंत्रित करने के बाद भी भगवान् शिव को आमंत्रित नहीं किया था. उसके बाद जब सती को पता चला की उनके पिता दक्ष ने बड़े यज्ञ का आयोजन किया तब वो वहा जाने के लिये उत्सुक हो गई,उन्होंने यज्ञ में जाने की इच्छा शिव को जताई,तब शिवजी ने कहा प्रिये किसी कारणवश प्रजापति दक्ष हमसे रुष्ट है,अतः बिना आमंत्रण वहा जाना ठीक नहीं होगा,सबको बुलाकर भी हमें जान बूझकर आमंत्रित नहीं किया गया है,इसलिए हमारा वह जाना उचित नहीं है.शिवजी के मना करने पर भी सती नहीं मानी,उनकी बहनो और माँ से मिलने की इच्छा प्रबल देखकर शिवजी ने उन्हें वहा जाने की अनुमति दे दी.किन्तु शिवजी के मना करने के बाद वहा जाने के बाद माँ सती को अपने अपमान का अनुभव हुआ,कोई भी उनसे ठीक तरह से बात नहीं कर रहा था.कोई भी वहा पर उनसे ठीक तरह से बात नहीं कर रहा था.सब लोग उनसे मुँह बिगाड़कर बात कर रहे थे.सिर्फ और सिर्फ उनकी माँ ने उनसे ठीक तरह से बात की. किन्तु परिजनों का ऐसा बर्ताव देखकर वो बहुत ही व्यथित हो गई,दक्ष ने तो उन्हें अपमानित कर व्यङ्ग भी किये,अनुचित शब्दों से प्रहार किया। उन्होंने मन में सोचा की शिव की बात न सुनकर यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है.वो अपने पति का अपमान सहन न कर सकी,उन्होंने वही पर योगाग्नि के माध्यम से अपना देह त्याग दिया। यज्ञ का विध्वंस कर दिया,यह सब जब शिवजी को पता चला तो शिवजी ने अपने गण को वहा भेजकर सम्पूर्ण यज्ञ का विनाश कर दिया।


वो ही माँ सती ने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय के यहाँ जन्म लिया।हिमालय पर्वतराज के वहा पुत्री रूप में प्रकट होने से वो शैलपुत्री कहलायी।

|| माँ शैलपुत्री कथा समाप्तः || 
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