श्री भृगु संहिता | सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र | Sarvarisht nivaran stotra | Shri Bhrigu Samhita |

श्री भृगु संहिता सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र 

श्री भृगु ऋषि के द्वारा रचित यह स्तोत्र सभी निवारण स्तोत्रों में सर्वोत्तम है.इस स्तोत्र के सिर्फ़ एक बार अनुष्ठान करने से 
अर्थात ४० पाठ करने से मनुष्य अपनी जन्मकुंडली में स्थित कोई भी ग्रह दोष या भूत प्रेत आदि दोषों का निवारण हो जाता है,
शत्रुओं पर विजय प्राप्त होता है,साथ ही सभी कार्यों में सफलता प्राप्त हो जाती है.

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 Sarvarisht nivaran stotra | Shri Bhrigu Samhita |
श्री भृगुसंहिता सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र 

श्री भृगु संहिता सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र 

ॐ गं गणपतये नमः|सर्व-विघ्न-विनाशाय, सर्वारिष्ट निवारणाय,सर्व सौख्य-प्रदाय-बालानां बुद्धि प्रदाय,नाना प्रकार-धन-वाहन-भूमि-प्रदाय,मनोवाञ्छित फल प्रदाय रक्षां कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ गुरवे नमः | ॐ श्री कृष्णाय नमः | ॐ बलभद्राय नमः | ॐ श्री रामाय नमः | ॐ हनुमते नमः | ॐ शिवाय नमः | ॐ जगन्नाथाय नमः | ॐ बदरीनारायणाय नमः | ॐ श्री दुर्गा-देव्यै नमः |
ॐ सूर्याय नमः,ॐ चन्द्राय नमः,ॐ भौमाय नमः,ॐ बुधाय नमः,ॐ गुरवे नमः,ॐ भृगवे नमः,ॐ शनिश्चराय नमः,ॐ राहवे नमः,ॐ पुच्छानयकाय नमः,ॐ नवग्रह रक्षा कुरु कुरु नमः | 
ॐ मन्येवरं हरिहरादय एव दृष्ट्वा द्रष्टेषु येषु हृदयस्थं त्वयं तोषमेति विविक्षते न भवता भुवि येन नान्य कश्विन्मनो हरति नाथ भवान्तरेपि | ॐ नमो मणिभद्रे | जय-विजय-पराजिते | भद्रे | लभ्यं कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात | सर्व विघ्नं शान्तं कुरु कुरु स्वाहा | 

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्री बटुकभैरवाय आपदुद्धारणाय महान-श्याम-स्वरूपाय-दिर्घारिष्ट-विनाशाय नाना प्रकार भोग प्रदाय मम सर्वरिष्टं हन हन,पच पच,हर हर,कच कच,राजद्वारे जयं कुरु कुरु,व्यवहारे लाभं वृद्धिं वृद्धिं,रणे शत्रुन विनाशय विनाशय,पूर्णा आयुः कुरु कुरु,स्त्री प्राप्तिं कुरु कुरु,हुम् फट स्वाहा |

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः | ॐ नमो भगवते, विश्व-मूर्तये,नारायणाय,श्री पुरुषोत्तमाय रक्ष रक्ष,युग्मदधिकं प्रत्यक्षं परोक्षं वा अजीर्णं पच पच,विश्व मूर्तिकान हन हन,एकाह्निकं द्वाह्निकं त्राह्निकम चतुरह्निकं ज्वरं नाशय नाशय,चतुरग्नि वातान अष्टादश-क्षयान रोगान,अष्टादश कुष्ठान हन हन,सर्वदोषं भंजय भंजय,तत सर्वं नाशय-नाशय,शोषय-शोषय,आकर्षय-आकर्षय,मम शत्रुं मारय मारय,उच्चाटय-उच्चाटय,विद्वेषय-विद्वेषय,स्तम्भय-स्तम्भय,निवारय-निवारय,विघ्नं हन हन,दह दह,पच पच,मथ मथ,विध्वंसय विध्वंसय,विद्रावय विद्रावय,चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ,चक्रेण हन हन, पा-विद्यां छेदय छेदय,चौरासी-चेटकान विस्फोटान नाशय-नाशय,वात-शुष्क-दृष्टि-सर्प-सिंह-व्याघ्र-द्विपद-चतुष्पद-अपरे बाह्यं ताराभिः भव्यन्तरिक्षं अन्यान्य व्यापि-केचिद- देश-काल-स्थान-सर्वान- हन हन,विद्युन्मेघ नदी-पर्वत,अष्ट-व्याधि,सर्व-स्थानानि,रात्रि-दिनं,चौरान वशय वशय,सर्वोपद्रव-नाशनाय,पर-सैन्यं विदारय विदारय,पर-चक्रं निवारय-निवारय,दह-दह,रक्षां कुरु कुरु,ॐ नमो भगवते,ॐ नमो नारायणाय,हुं फट स्वाहा |

ठः ठः ॐ ह्रीं ह्रीं | ॐ ह्रीं क्लीं भुवनेश्वर्याः श्री ॐ भैरवाय नमः | हरी ॐ उच्छिष्ट-देव्यै नमः | डाकिनी-सुमुखि-देव्यै,महा-पिशाचिनी ॐ ऐं ठः ठः |

ॐ चक्रिण्या अहं रक्षां कुरू कुरू,सर्व-व्याधि-हरणी-देव्यै नमो नमः | सर्व प्रकार बाधा शमनमरिष्ट निवारणं कुरु कुरु फट | श्रीं ॐ कुब्जिका देव्यै ह्रीं ठः स्वाहा | शीघ्रमरिष्ट निवारणं कुरु कुरु शबरी क्रीं ठः स्वाहा | शारिका भेदा महामाया पूर्णं आयुः कुरु | हेमवती मूलं रक्षा कुरु | चामुण्डायै देव्यै शीघ्रं विघ्नं सर्वं वायु कफ पित्त रक्षां कुरु | मन्त्र तंत्र यंत्र कवच ग्रह पीड़ा नडतर,पूर्व जन्मदोष नडतर,यस्य जन्म दोष नडतर,मातृदोष नडतर,पितृदोष नडतर,मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण स्तम्भन उन्मूलनं भूत प्रेत पिशाच जात जादू टोना शमनं कुरु | सन्ति सरस्वत्यै कंठिका देव्यै गल विस्फोटकायै विक्षिप्त शमनं महान ज्वर क्षयं कुरु स्वाहा | सर्व सामग्री भोगं सप्त दिवसं देहि देहि,रक्षां कुरु क्षण क्षण अरिष्ट निवारणं,दिवस प्रति दिवस दुःख हरणं मंगल करणं कार्य सिद्धिं कुरु कुरु | हरि ॐ श्री रामचन्द्राय नमः |

हरि ॐ भूर्भुवः स्वः चंद्र तारा नवग्रह शेषनाग पृथ्वी देव्यै आकाशस्य सर्वारिष्ट निवारणं कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीवासुदेवाय नमः,बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय मम रक्षां कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीविष्णु भगवान् मम अपराध क्षमा कुरु कुरु,सर्व विघ्नं विनाशय,मम कामना पूर्णं कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं बटुकभैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरु कुरु स्वाहा | 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ श्रीदुर्गा देवी रुद्राणी सहिता, काल भैरव सह,बटुक भैरवाय,हनुमान सह मकर ध्वजाय,आपदुद्धारणाय मम सर्व दोषक्षमाय कुरु कुरु सकल विघ्न विनाशाय मम शुभ मांगलिक कार्य सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा || 

फलश्रुतिः 

एष विद्या माहात्म्यं च,पुरा मया प्रोक्तं ध्रुवं | 
शमक्रतो तु हन्त्येतान सर्वाश्च बलि दानवाः || 
य पुमान पठते नित्यं एतत स्तोत्रं नित्यात्मना | 
तस्य सर्वान हि सन्ति यत्र दृष्टि गतं विषं || 
अन्य दृष्टि विषं चैव न देयं संक्रमे ध्रुवम | 
संग्रामे धारयेत्येम्बे उत्पाता च विसंशयः || 
द्रुतं सद्यं जयस्तस्य विघ्नस्तस्य न जायते | 
किमत्र बहुनोक्तेन सर्व सौभाग्य सम्पदा || 
लभते नात्र संदेहो नान्यथा वचनं भवेत् | 
ग्रहीतो यदि वा यत्नं बालानां विविधैरपि || 
शीतं समुष्णतां याति उष्णः शीत मयो भवेत् | 
नान्यथा श्रुतये विद्या पठति कथितं मया | 
भोजपत्रे लिखेद यन्त्रं गोरोचन मयेन च || 
इमां विद्यां शिरो बद्ध्वा सर्व रक्षा करोतु में | 
पुरुषस्याथवा नारी हस्ते बद्ध्वा विचक्षणः || 
विद्रवन्ति प्रणश्यन्ति धर्मस्तिष्ठति नित्यशः | 
सर्वशत्रुरधो यान्ति शीघ्रं ते च पलायनम || 

|| श्री भृगुऋषि कृतं सर्वारिष्टनिवारण स्तोत्रम सम्पूर्णम || 
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