सम्पूर्ण नारायण कवच विधी | Narayan Kavach |


सम्पूर्ण नारायण कवच विधी

सम्पूर्ण नारायण कवच विधी | Narayan Kavach |
श्री नारायण कवच 


सर्वप्रथम जाने नारायण कवच क्या है ?
नारायण यानी भगवान् विष्णु का एक शक्तिशाली नाम कवच यानी हमारी सुरक्षा करे वो मतलब बख्तर | 
एक तरह से जो परिचित या अपरिचित शत्रुओ से जो सदैव हमारी रक्षा करे ऐसा उत्तम कवच | क्युकी इस का माहात्म्य श्रीमद भगवत के षष्ठं स्कन्द में विस्तार पूर्वक बताया हुआ है तो आइये वो भी जाने भगवत के माध्यम से | विश्वरूपजी ने यह कवच देवता इंद्र को दिया था । इसी कवच को धारण करके इंद्र ने पुनः विजय प्राप्त किया था | 



नारायण कवच कथा 
एकबार विश्वरूप यज्ञ कर रहे थे तब दैत्यों ने उनसे प्रार्थना की आप सब को यज्ञ का भाग दे रहे है कृपया हमें भी यज्ञ का भाग प्रदान करे | और विश्वरूप ने दैत्यों को भी यज्ञ का भाग प्रदान किया | किन्तु इन्द्र से यह बर्दाश्त नहीं हुआ और इंद्र ने जो यज्ञ कर रहे थे उन्हीका सर काट दिया | विश्वरूप के तीन सिर कट गए उनमे से तीन पक्षिओ का प्रकटीकरण हुआ | और इंद्र को ब्रह्महत्या का श्राप लगा | बाद में उस ब्रह्महत्या को चार भाग में विभाजित किया | एक भाग स्त्रीयो को प्रदान किया जो रजस्वला में रहने का वरदान मिला,एक भाग वृक्षों को प्रदान किया जिसे गोंद का वरदान मिला,एक भाग पृथ्वी को मिला जो खड्डे का वरदान प्राप्त करती है,एक भाग जल को मिला जो शैवाल को वरदान प्राप्त हुआ.और यह वरदान ब्रह्महत्या के बदले उन्हें प्राप्त हुए थे.
जब विश्वरूप के पिता त्वष्टा को पता चला की इंद्र ने उनके पुत्र की हत्या की है तब इंद्र को मारडाले ऐसा पुत्र प्राप्त करने के लिए पुत्र प्राप्त हो इसके लिए यज्ञ किया | किन्तु उनसे एक भूल हुई मंत्र में की की उन्होंने "इंद्रशत्रो र्विवर्द्धस्य माँचिरं जहि विद्विषं" अर्थ है की इंद्र को मारे किन्तु उन्होंने मन्त्र में बोलै "इन्द्र शत्रोर्विवर्धस्व" उसने मंत्र के माध्यम से गलती करि और उसका अर्थ विपरीत हो गया और वो बोलै की इन्द्र को गुरु करे और उसको मारे ऐसा नहीं किन्तु उनके हाथो से मरे ऐसा पुत्र प्रदान करे.ऐसा पुत्र यज्ञ में से  उत्पन्न हुआ वृत्रासुर | पिता की आज्ञा से वृत्रासुर सैन्य को तैयार कर इंद्र को मारने की तैयारी में लग गया.वृत्रासुर बलवान था वो देवो के सभी शस्त्रों को निगल गया.सभी देवता भयभीत हो गए और नारायण की शरण में गए.तब नारायण ने उपाय बताया की वृत्रासुर ऐसे नहीं मरेगा आपको दधीचि मुनि के अस्थियो में से शस्त्र बनाकर उसे मारना होगा तब ही वो मरेगा | सभी देवता दधीचि मुनि के पास जाकर स्तुति करने लगे और कहा की आप संत हो और संत तो समाजकल्याण के लिए ही जीते है जो समाज को सबकुछ देने में समर्थ है वो ही है संत क्युकी संत कभी अपने लिए नहीं जीते।तब देवताओ ने वृत्रासुर का सर्ववृतान्त सुनाया और कहा की भगवान् ने कहा की आपकी अस्थियो में से बने शस्त्र से ही वो मर सकता है.आप हम पर कृपा करे.तब दधीचि मुनि ने सीधा ही कहदिया की आप मुझे मारने आये हो ऐसा कहो.किन्तु आपकी स्तुति से प्रसन्न होने के कारण में आपको अपनी अस्थिया देने के लिए तैयार हु ऐसा आप मत सोचिये लेकिन भगवान ने आपको यहाँ भेजा है इसलिए में आपको दूंगा।ऐसा कहकर दधीचि मुनि ने योगाग्नि से अपने शरीर को त्याग दिया।
पश्चात् देवताओ ने उनकी अस्थियो में से वज्र बनाया | और वो वज्र स्वयं विश्वकर्मा जी ने बनाया | उसी वज्र को इंद्र ने अपने हाथो में लेकर ऐरावत हाथी पर सवार होकर वृत्रासुर के साथ युद्ध करने लगे.वृत्रासुरने इंद्र के हाथो को मारा किन्तु इंद्र के पास अमृत था उस अमृत को लेकर थोड़ा हाथी  के ऊपर छिड़का हाथी तुरंत खड़ा हो गया | लेकिन वृत्रासुर ने त्रिशूल से इंद्र के हाथो पर प्रहार किया और जैसे ही प्रहार किया इंद्र के हाथो से वज्र निचे गिर गया सभी देवता भयभीत हो गए की अब क्या होगा ? इंद्र शस्त्रहीन हो गए लेकिन वृत्रासुर की युद्ध निति देखिये | उसने कहा में योद्धा हु शस्त्रहीन के ऊपर कभी वार नहीं करता | इंद्र ने स्वयं इस नीतिको सराहा | 
जैसे ही इंद्र ने वज्र को उठाया वृत्रासुर ने कहा की हे इंद्र मुझे पता है की तुम्हारे हाथो में जो वज्र है उससे मेरी मृत्यु होगी और वो दधीचि मुनि की अस्थियो में से बना हुआ है.मेरी मृत्यु और पराजय वो ही आपकी विजय है। ऐसा कहकर उसने कहा की आपके वज्र में मुझे मेरे भगवान् के दर्शन हुए है। ऐसा कहकर उसने चतुःश्लोकि भागवत की रचना की या यह भी कह सकते है की प्रार्थना की | जिसे हम परिचित है | 
कहने का तात्पर्य है की भगवान् ने इन्द्र को इस नारायण कवच दिया तब इंद्र ने पुनः विजय प्राप्त किया था | 

विश्वरूप कौन है ?  
विश्वरूप भगवान् विष्णु का ही एक स्वरुप है जिसके दर्शन भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को दिया था | 
विष्णुसहस्त्र में भी भगवान विष्णु के सहस्त्र नामो में बताया हुआ एक नाम और स्वरुप है | 



नारायण कवच विधी 
इस कवच के पाठ में न्यास का विधान है जो जरुरी और महत्वपूर्ण है | 
इस न्यास में भगवान् विष्णु के अष्टाक्षरी मंत्र "ॐ नमो नारायणाय " मंत्र का प्रयोग कर सकते है या द्वादशाक्षरी मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मन्त्र से भी न्यास कर सकते है।  या हम जो इस कवच में न्यास बता रहे है वो न्यास करने के बाद कवच का आरम्भ करे | 

न्यास विधि 
अङ्गन्यास: 
ॐ ॐ नमः पादयोः | बोलकर अपने दोनो पैरो को स्पर्श करे | 
ॐ नं नमः जानुनोः | बोलकर अपनी दोनो घुटनो को स्पर्श करे | 
ॐ मों नमः ऊर्वोः | बोलकर दोनों जंघाओं को स्पर्श करे | 
ॐ नां नमः उदरे | बोलकर अपने उदर को स्पर्श करे | 
ॐ रां नमः हृदि | बोलकर अपने ह्रदय को स्पर्श करे | 
ॐ यं नमः उरसि | बोलकर अपनी छाती को स्पर्श करे | 
ॐ णां नमः मुखे | बोलकर अपने मुख को स्पर्श करे | 
ॐ यं नमः शिरसि | बोलकर अपने सिर को स्पर्श करे | 
करन्यास:
ॐ ॐ नमः दक्षिणतर्जन्यां नमः | बोलकर अपने दाए हाथ की तर्जनी को स्पर्श करे | 
ॐ नं नमः दक्षिणमध्यमायां | बोलकर दाए हाथ की मध्यमा को स्पर्श करे | 
ॐ मों नमः दक्षिणानामिकायां | बोलकर दाए हाथ की अनामिका को स्पर्श करे | 
ॐ भं नमः दक्षिणकानिष्ठिकायां | बोलकर दाए हाथ की कनिष्ठिका को स्पर्श करे | 
ॐ गं नमः वामकनिष्ठिकायां | बोलकर अपने बाए हाथ की कनिष्ठिका को स्पर्श करे | 
ॐ वं नमः वामानामिकायां | बोलकर बाए हाथ की अनामिका को स्पर्श करे | 
ॐ तेँ नमः वाममाध्यमायां | बोलकर बाए हाथ की मध्यमा को स्पर्श करे |  
ॐ वां नमः वामतर्जन्यां | बोलकर बाए हाथ की तर्जनी को स्पर्श करे | 
ॐ सुं नमः दक्षिणाङ्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि | बोलकर दाए हाथ के अंगूठे के ऊपर पर्व को स्पर्श करे | 
ॐ दें नमः दक्षिणांगुष्ठाय पर्वणि | बोलकर दाए हाथ के अंगूठे के सभी पर्वो को स्पर्श करे | 
ॐ वां नमः वामांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि | बोलकर अपने बाए हाथ के अंगूठे के ऊपर के पर्व को स्पर्श करे | 
ॐ यं नमः वामांगुष्ठाय पर्वणि | बोलकर बाए हाथ के अंगूठे के सभी पर्वो को स्पर्श करे | 
श्रीविष्णुषडक्षरन्यास:
ॐ ॐ नमः हृदये | बोलकर ह्रदय को स्पर्श करे | 
ॐ विं नमः मूर्धनि | बोलकर सिर का स्पर्श करे | 
ॐ षं नमः भ्रुवोर्मध्ये | बोलकर दोनों भौहो के बीच स्पर्श करे | 
ॐ णं नमः शिखायां | बोलकर शिखा को स्पर्श करे | 
ॐ वें नमः नेत्रयोः | बोलकर दोनों नेत्रों को स्पर्श करे | 
ॐ नं नमः सर्वसन्धिषु | बोलकर देह की सभी संधियों को स्पर्श करे ( घुटना,बाहु,केहनी,पैरो और कटी का भाग,होठ )
ॐ मः अस्त्राय फट प्राच्यां | बोलकर पूर्व की और चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फट आग्नेयां | बोलकर अग्नि कोने में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फ़ट दक्षिणस्यां | बोलकर दक्षिण दिशा में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फ़ट नैऋत्ये | बोलकर नैऋत्य कोने में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फ़ट प्रतीच्यां | बोलकर पश्चिम दिशा में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फट वायव्ये | बोलकर वायु कोने में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फट उदीच्यां | बोलकर उत्तर दिशा में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फट ऐशान्यां | बोलकर ईशान कोने में चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फट उर्ध्वायां | बोलकर ऊपर की और देखकर चुटकी बजाये | 
ॐ मः अस्त्राय फ़ट अधरायां | बोलकर नीचे जमीन की और देखर चुटकी बजाये | 

यह सम्पूर्ण न्यास करने के बाद कवच का स्पष्ट उच्चारण करते हुए आरम्भ करे | 

ॐ श्रीगणेशाय नमः | 
ॐ विष्णवे नमः | 
ॐ नमो नारायणाय | 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | 

नारायण ध्यानं 
ॐ नमो स्त्वनन्ताय सहस्त्रमूर्तये सहस्त्रपादा क्षिशिरोरु बाहवे | 
सहस्त्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्त्र कोटि युग धारिणे नमः || 



राजोवाच 

यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान रिपुसैनिकान | 
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियं || १ || 
भगवंस्तंममाख्याहि वर्म नारायणात्मकं | 
ययाऽऽततायिनः शत्रून येन गुप्तोऽजयन्मृते || २ || 
परीक्षितजी ने श्रीशुकदेव जी से पूछा - हे महामुनि जिस नारायण कवच से इंद्र ने शत्रुओ का विनाश किया और अपना रक्षण किया,राजभोग का उपभोग किया उस नारायण कवच को मुझे भी सुनाइए | यह भी बताइये की इन्द्र ने कैसे नारायण कवच से राक्षसों की आततायि राक्षसों पार विजय प्राप्त किया ? 




श्रीशुकउवाच 

वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायाऽनुपृच्छते | 
नारायणारूपं वर्माहं तदिहैकमनाः श्रुणु || ३ || 
पश्चात् श्रीशुकदेवजी ने कहा - देवताओंके द्वारा पुरोहित के रूप में वरण किये जाने पर महात्मा विश्वरूपजी ने इन्द्र के पूछने पर जिस नारायणकवच का उपदेश किया उसे आप एकाग्र चित्त से श्रवण कीजिये | 
विश्वरूपउवाच 
धौतांघ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदंगमुखः | 
कृतस्त्वांगकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः || ४ || 
नारायणमयं वर्म सन्नह्येद भय आगते | 
पादयोर्जानुनोरुर्वोरुदरे ह्यद्यथोरसि || ५ || 
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंंकारादिनी विन्यसेत | 
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि च || ६ || 
विश्वरूप ने कहा - हे देवराज इंद्र भय का समय उपस्थित होने पर मनुष्य या साधक अपने हाथ-पैर धोकर आचमन करे,कुश की पवित्री धारण करे,उत्तर की और मुखकर बैठ जाए | फिर "ॐ नमो नारायणाय" तथा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्रो से अङ्गन्यास करे और करन्यास करे | न्यास करने के बाद नारायण कवच से अपनी रक्षा करे | 
करन्यासं ततः कुर्याद द्वादशाक्षर विद्यया | 
प्रणवादि यकारांतमंगुल्यङ्गुष्ठ पर्वसु || ७ ||   
न्यसेद्धृदय ओंकारं विकारमनु मूर्धनि | 
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत || ८ || 
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु | 
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद बुधः || ९ || 
ॐ विष्णवे नम इति || १० || 
इन सभी श्लोको में नारायण कवच के पाठ का विधान और न्यास बताया हुआ है जो हमने ऊपर प्रारम्भ में ही बताया हुआ है इसलिए यहाँ पुनः इसका अर्थ नहीं दिया है |




आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षटशक्तिभिर्युतं | 

विद्या तेजस्तपीमूर्तिर्मिमं मन्त्रमुदाहरेत || ११ ||   
न्यास सम्पूर्ण करने के बाद साधक षडैश्वर्य युक्त भगवान् का ध्यान धरे |
 विद्या तेज और तपस्वरूप इस कवच का पाठ करे | 



|| अथ नारायण कवच आरम्भः || 


ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे | 
दरा-ऽरि-चर्मा-ऽसि-गदेषु-चाप-पाशान दधानोऽष्टगुणोंऽष्टबाहुः || १२ || 

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादो गणेभ्यो वरुणस्य पाशात | 

स्थलेषु मायावटु वामनोऽव्यात त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः || १३ || 

दुर्गेष्टव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः | 

विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनदुर्यपतंश्च गर्भाः || १४ || 

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्र योन्नीतधरो वराहः | 

रामोद्रीऽकुटेश्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद भरताग्रजोऽस्मान || १५ || 

मामुग्रवर्मादखिलात प्रमादा न्नारायणः पातु नरश्च हासात | 

दत्तस्त्वयोगदथ योगनाथः पायाद गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात || १६ || 

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा द्वयशीर्षा मां पथि देवहेलनात | 

देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनांतरात कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात || १७ || 

धन्वन्तरिर्भगवान पात्वपथ्याद द्वंद्वाद भयादृषभो निर्जितात्मा | 

यज्ञश्च लोकादवताज्जनांताद बलों गणात क्रोधवषादहिन्द्रः || १८ || 

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद बुद्धस्तु पाखंडगणात प्रमादात | 

कल्किः कलेः कालमलात प्रपातुधर्मावनायोरु कृतावतारः || १९ || 

मां केशवो गदया प्रातरव्याद गोविन्द आसंगवमात्तवेणुः | 
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति र्मध्यन्दिने विष्णुररींद्रपाणिः || २० || 
 जो भगवान श्रीहरि, गरुड़की पीठपर अपना पैर रखे हुए है और अपने आठ बाज़ुओंमे शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश धारण किए हुए है, तथा जो अष्टसिद्धियों से सर्वदा संयुक्त रहने वाले है, ऐसे प्रणवस्वरूप (ओंकार )भगवान श्रीहरि हमारी रक्षा करें।|| १२ || मत्स्यावतार भगवान विष्णु जलमें, जलजन्तुओं तथा वरुण के पाश से हमारी रक्षा करें। मायासे ब्रह्मचारी का रूप धारण करनेवाले भगवान वामन स्थलमें तथा विराटस्वरूपधारी भगवान त्रिविक्रम आकाशमें रक्षा करे।  || १३ || असुर समूहोंके शत्रु वे भगवान नृसिंह घोर जंगल,विकट स्थान तथा रणभूमि आदि भयानक स्थानोमे मेरी रक्षा करे, जिनके भयानक अटटहास से दिशाए गूंज उठी थी तथा गर्भवती दैत्यपत्नियोंके गर्भ भी गिर गये थे। || १४ || अपने दांतो से पृथ्वीका उद्धार करनेवाले यज्ञस्वरूप भगवान वराह मार्ग मे मेरी रक्षा करे।  पर्वतों के शिखरपर भगवान परशुराम तथा प्रवास में लक्ष्मण-सहित भगवान श्रीराम हमारी रक्षा करें। || १५ || भगवान नारायण सम्पूर्ण उग्रधर्म ( मारण, मोहन, उच्चाटनादि ) तथा सभी प्रकारके प्रमादोंसे हमारी रक्षा करे।  भगवान नर उपहास  ( निन्दा ) आदि से हमारी रक्षा करें।  योगेश्वर भगवान दत्तात्रेय विघ्न से तथा त्रिगुणाधिपति भगवान कपिल कर्मके बन्धनोंसे हमारी रक्षा करे।  || १६ || सनत्कुमार काम देवसे तथा हयशीर्ष मार्ग में देवविग्रहों के अपमानसे हमारी रक्षा करे।देवर्षि नारद अन्य पुरुषोंके अर्चनजन्य अपराधोसे तथा भगवान कूर्म समस्त नरकोंसे हमारी रक्षा करे। || १७ || भगवान धन्वन्तरि अमथ्य भोजनसे तथा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनेवाले भगवान ऋषभदेव सुख - दुःख, शीत - ताप आदि द्रन्द्रों से हमारी रक्षा करे। भगवान यज्ञ लोक के भयसे तथा बलभद्र मनुष्यकृत कष्टोंसे एवं रोष, क्रोधवश आदि सर्पगणोंके क्रोध से हमारी रक्षा करे। || १८ || भगवान द्वैपायन अज्ञानसे तथा बुद्धिदेव पाखंडियो से और आलस्यसे हमारी रक्षा करें।  भगवान कल्कि कलिजन्य पापो से हमारी रक्षा करे। जो धर्म की रक्षा करनेके लिये ही अवतार धारण करते हैं। || १९ || भगवान केशव अपनी गदासे प्रातः कालमे, भगवान गोविन्द अपनी बाँसुरीसे सूर्योदयानन्तर कुछ दिन चढ़ आनेपर दोपहर के पूर्व तीक्ष्ण शक्तिवाले भगवान नारायण तथा चक्रधारी भगवान विष्णु मध्याह्ममें हमारी रक्षा करे। || २० ||


देवोऽपराह्ने मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामाऽवतु माधवो माम | 
दोषे हृषीकेश ऊतार्धरात्रे निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः || २१ || 

श्रीवत्सधामाऽपररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः | 
दमोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः || २२ || 

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत समन्ताद भगवत्प्रयुक्तं | 
दंदग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताशः || २३ || 

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिंगे निष्पिण्ढि निष्पिंढ्यजितप्रियाऽसि | 
कूष्माण्ड वैनायक यक्ष रक्षो भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयाऽरीन || २४ || 

त्वं यातुधान प्रमथ प्रेत मातृ पिशाच विग्रग्रह घोरदृष्टिन | 
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोंऽरेहृदयानि कम्पयन || २५ || 
तीसरे पहर प्रचंड धनुष धारण करनेवाले भगवान मधुकैटप, सायंकालमें ब्रह्मा आदि त्रितय देवैषी युक्त भगवान माधव हमारी रक्षा करें।रात्रिमे भगवान तथा अर्धरात्रि में भगवान पद्मनाम हमारी रक्षा करे || २१ || रात्रिके पिछले प्रहरमें श्रीवत्सला भगवान श्री हरि उषाकालमें खड्गधारी भगवान जनार्दन, सूर्योदयके पूर्व भगवान दामोदर एवं कालमूर्ति भगवान विश्वेश्वर तीनों सन्धिकालोमें हमारी रक्षा करे।|| २२ || जिसके कीनारेका भाग प्रलयकालीन अग्निके समान अत्यंत तीव्र है, जो भगवानके द्वारा चलाये जाने पर चारो और घूमता रहता है ऐसे वह चक्र सुदर्शन मेरे शत्रुओंकी सेनाको बारम्बार इस प्रकार दग्ध करता रहे जिस प्रकार वायुसे प्रेरित होनेवाला अग्नि तृण पूंजो ( समूहो ) को नष्ट करदेता है।|| २३ || भगवानको जिस गदा ( चिनगारियों ) का स्पर्श वज्र के स्पर्श के समान दुःसह है, तथा भगवान अजितको अत्यंत प्रिय है, ऐसी वह कौमोदकी गदा मेरे शत्रुओको कुष्मांड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भुत तथा ग्रहोंको चूर्णचूर्ण  करें। || २४ || भगवानके द्वारा फुके जानेपर अत्यंत भयावह शब्द करनेवाले है  पाञ्चजन्य  तुम मेरे शत्रुओं के हदय को दहलाते हुए शीघ्र ही यहाँ के राक्षस,प्रमथ, प्रेत, मातृगण, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि,घोर दृष्टिवाले प्राणियों को यहाँ से भगा दो।|| २५ ||



त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि | 
चक्षूंषि चर्मञचतचन्द्र चादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषान || २६ || 

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत केतुभ्यो नृभ्य एव च | 
सरीसॄपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योऽहोम्य एव वा || २७ || 

सर्वान्येताणि भगवन्नामरुपास्त्रकीर्तनात | 
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतिपकाः || २८ || 

गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः | 
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वानामभिः || २९ || 

सर्वापद्भयो हरेर्नाम रूप यानाऽयुधानि नः | 
बुद्धीन्द्रियः मन प्राणात पान्तु पार्षदभूषणाः || ३० || 


  है तीक्ष्ण धारवाले भगवानके श्रेष्ठ असिवर ! तुम भगवान् की प्रेरणासे शीघ्र ही मेरे शत्रुओंकी सेना को छिन्न - भिन्न कर दो। हे शतचन्द्रके समान चमकनेवाले भगवानके ढाल ! आप मेरे पापी शत्रुओंके नेत्रोंको बंद कर दीजिये तथा उन पापियों को अन्धा बना दीजिये। || २६ || सूर्यादि दुष्ट ग्रहोंसे उल्कापातादि केतुओंसे, मनुष्योंसे, सर्पोसे, भयावह दांत वाले जन्तुओंसे तथा पापोंसे उत्पन्न होनेवाले सभी प्रकारके भय तथा मेरे कल्याण के बाधक सभी प्रकारके आश्रय भगवानके नाम रूप तथा आंखोके कीर्तनेसे शिघ्र ही नष्ट हो जाये।|| २७-२८ || बृहदरथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की गयी है ऐसे छन्दोमय शरीर वाले भगवान गरुड़ मुझे सब प्रकारकी आपत्तियों से बचाये तथा भगवान विष्वक्सेन अपने नामो से हमारी रक्षा करे। || २९ || भगवान श्रीहरिके नाम, वाहन तथा अस्त्र सम्पूर्ण आपत्तियोंसे हमारी तथा भगवान के श्रेष्ट पार्षद हमारी बुद्धि,इन्द्रिय,मन तथा प्राणोंकी रक्षा करे || ३० ||  


यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत | 
सत्येनाऽनेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः || ३१ || 

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम | 
भूषणाऽयुधलिंगाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया || ३२ || 

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः | 
पातु सर्वैः स्वरूपैर्न: सदा सर्वत्र सर्वगा: || ३३ || 

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमध: समन्ता दन्तर्बहिर्भगवान नारसिंहः | 
प्रहापयँलोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्तेजाः || ३४ || 

मधवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकं | 
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान || ३५ || 
यदि सत और असत रूपात्मक जगत ही 

एतद धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुसा | 
पदा वा संस्पृशेत सद्यः साध्वसात स विमुच्यते || ३६ || 

न कुतश्चिद भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् | 
राजदस्यु ग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित || ३७ || 

इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन द्विजः | 
योगधारणया स्वांङ्गं जहौ स मरूधन्वनि || ३८ || 

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा | 
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः || ३९ || 

गगनान्न्य पतत सद्यः सविमानो ह्यवाकशिराः | 
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात | 
स बालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः || ४० || 
यदि सत और असत निर्गुण और सगुण रूपात्मक जगत ही भगवान् का स्वरुप है,उसी सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जाए || ३१ || अगर ब्रह्म और आत्मा का अनुभव करने वाले योगियों और मुनियो की दृष्टि में भगवान् सभी प्रकार के विकल्पों से रहित है और वो ही माया के प्रभाव से भूषण,आयुध,लिङ्ग स्वरूपधारण करनेवाले है,यह शास्त्र प्रतिपादित है वो ही भगवान् श्री हरी सत्य के प्रभाव से अपने सभी स्वरूपों से सर्वत्र हमारी रक्षा करे || ३२-३३ || 
जो भगवान् नृसिंह अपने भयंकर अटटहास से लोक का भय दूर करते है तथा अपने तेज से सभी के तेज को ग्रास करते है वो ही भगवान् नृसिंह दिशा,विदिशा,निचे,ऊपर,तथा सभी प्रकार से हमारी रक्षा करे || ३४ || हे इन्द्र मैंने यह नारायण कवच तुमको बता दिया है,जिससे युक्त होकर तुम अनायास ही असुरो के सामने बिना परिश्रम ही विअज्य प्राप्त करोगे || ३५ || 
हे देवराज इन्द्र,इस नारायणी विद्याको धारण करने वालो को राजा,डाकू,ग्रह,व्याघ्रादि भयंकर प्राणी,तथा अन्य किसी से कभी कोई भय नहीं रहता || ३७ || कौशिक गोत्रवाले किसी ब्राह्मण ने इस विद्याको धारण कर योग धारणा से अपना शरीर मरूधन्व देश में त्याग दिया || ३८ || चित्ररथ जो गन्धर्वो के राजा थे,जहा उस ब्राह्मण का देह पड़ा था,उसके ऊपर से स्त्रियों के साथ विमान पर बैठकर जा रहे थे || ३९ || वहा आते ही वे निचे की और सिर के बल विमान साहिर गिर पड़े | इस घटना से वो आश्चर्यचकित हो गए ,जब बालखिल्य महर्षियो ने बताया की यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है तब उन्होंने उस ब्राह्मण की अस्थियो को लेकर पश्चिम वाहिनी सरस्वती में प्रवाहित कर दिए | और स्नान करके अपने लोक को चले गए || ४० || 



श्रीशुक उवाच 
य इदं शृणुयात काले यो धारयति चादृतः | 
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात || ४१ || 

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः | 
त्रैलोक्यलक्ष्मी बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान || ४२ || 
श्रीशुकदेवजी ने कहा 
हे परीक्षित जो लोग इस नारायण कवच को समय से सुनते है और आदर पूर्वक इसे धारण करते है,वे भय से मुक्त होकर निर्भय हो जाते है,तथा सभी प्राणी उन्हें नमस्कार करते है || ४१ || हे परीक्षित इंद्र ने विश्वरूप से इस वैष्णवी विद्याको प्राप्त कर युद्ध में सभी असुरोको जित लिया और वे त्रैलोक्यकी लक्ष्मीका उपभोग करने लगे || ४२ || 

|| इति श्रीमद्भागवते महापुराणे षष्ठस्कन्धेऽष्टमेऽध्याये नारायणकवचं समाप्तं || 
|| इस प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण के छठे स्कंध के आठवे अध्याय में कहा हुआ नारायणकवच समाप्त हुआ || 






  




  






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