त्रैलोक्य विजय विद्या | Trailokya Vijay Vidhya |


त्रैलोक्य विजय विद्या

तीनो लोको में विजय दिलाती है यह विद्या
कोई भी असंभव कार्य को संभव बनाने वाली विद्या
जो अग्निपुराण में वर्णित है
त्रैलोक्य विजय विद्या | Trailokya Vijay Vidhya |
त्रैलोक्य विजय विद्या 

ईश्वर उवाच
त्रैलोक्य विजयां वक्ष्ये सर्वयन्त्र विमर्दिनीम ||
ॐ ह्रूं क्षूं  ह्रं, ॐ नमो भगवति दंष्ट्रिणि 
भीमवक्त्रे महोग्ररुपे हिलि हिलि,
रक्तनेत्रे किलि किलि, महानिस्वने कुलु, 
ॐ विद्युज्जिह्वे कुले ॐ निर्मासे कट कट,
गोनसाभरणे चिलि चिलि, 
शवमालाधारिणि द्रावय, 
ॐ महारौद्रि सार्द्रचर्मकृताच्छदे
विजृम्भ, ॐ नृत्यासिलताधरिणी 
भृकुटीकृतापांगे विषमनेत्रकृतानने वसामेदोविलिप्तगात्रे
कह कह,  ॐ हस हस, क्रुध्य क्रुध्य,
 ॐ नीलजीमूतवर्णेअभ्रमालाकृताभरणे विस्फुर
ॐ घण्टारवाकिर्णदेहे, ॐ सिंसिस्थेअरुणवर्णे, 
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं रौद्ररूपे ह्रूं ह्रीं क्लीं,
ॐ ह्रीं ह्र मोमाकर्ष, ॐ धून धून, 
ॐ हे हः स्वः खः, वज्रिणि हूं क्षूं क्षां क्रोधरूपिणि
प्रज्वल प्रज्वल, ॐ भीमभीषणे भिन्द,
 ॐ महाकाये छिन्द, ॐ करालिनि किटि किटि ,
महाभूतमातः सर्वदुष्टनिवारिणि जये, 
ॐ विजये ॐ त्रैलोक्यविजये ह्रूं फट स्वाहा ||

माहात्म्य
नीलवर्णां प्रेतसंस्थां विंशहस्तां यजेज्जये |
न्यासं कृत्वा तु पञ्चाङ्गं रक्तपुष्पाणि होमयेत |
सङ्ग्रामे सैन्यभङ्गःस्यात्रैलोक्य विजयापठात ||
ॐ बहुरूपाय स्तम्भय स्तम्भय, ॐ मोहय,
ॐ सर्वशत्रुन्द्रावय, ॐ ब्रह्माणमाकर्षय, ॐ विष्णुमाकर्षय,
ॐ महेश्वरमाकर्षय, ओमिन्द्रं टालय, ॐ पर्वताँश्चालय, 
ॐ सप्तसागरांशोषय,ॐ छिन्द च्छींद बहुरूपाय नमः |
भुजङ्ग नाममृन्मूर्तिसंस्थं विद्यादरिं ततः ||

सम्पूर्णं ||   

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