शनिदेव की कथा | शनिदेव को शनिवार क्यों तेल चढ़ाया जाता है ? Shanidev ko tel kyu chadhaya jata hai ?


शनिदेव की कथा | शनिदेव को शनिवार क्यों तेल चढ़ाया जाता है ?


शनिदेव की कथा | शनिदेव को शनिवार क्यों तेल चढ़ाया जाता है ?
 शनिदेव को शनिवार क्यों तेल चढ़ाया जाता है ? 


शनिदेव  भगवान् सूर्य और उनकी पत्नी संज्ञा के पुत्र है | संज्ञा दक्ष प्रजापति की पुत्री है | और शनिदेव कर्म के देवता के रूप में भी पूजे जाते है | कुछ लोग शनिदेव को नौग्रहों में सबसे भयभीत ग्रह भी मानते है | इसका प्रभाव एक राशि में ढाई साल तक और साढ़ेसाती के रूप में लम्बी अवधि तक रहता है | नौ ग्रह में शनि की गति सबसे मन्द है | यानी बहुत धीमी गति से चलते है | क्यों की वो लंगड़ाकर चलते है | 


क्यों शनिदेव लंगड़ाकर चलते है ? 

इसके पीछे पौराणिक कथा है और सूर्य तंत्र में भी कथा है | 
एक बार सूर्यदेव का तेज सहन न कर पाने की वजह से संज्ञा देवी ने अपने ही देह से अपने जैसी प्रतिमूर्ति तैयार की जो हूबहू उनके जैसे ही दिखती थी | संज्ञा ने उनका नाम छाया रखा | ( कुछ जगह प्रमाण मिलते है की स्वर्णा नाम था ).
उसे आज्ञा दी की तुम मेरी अनुपस्थिति में मेरी सारी सन्तानो का ख्याल रखना | और सूर्यदेव की सेवा कर पत्नी का सुख भोगना | ये आदेश देकर वो अपने पिता दक्ष के वहा चली गई | और छाया ने भी या स्वर्णा ने भी अपने आपको सूर्य देव की पत्नी के स्वरुप में ही ढाल दिया |
 इस बीच में स्वर्णा को सूर्य देव से पांच पुत्र और दो पुत्रिया हुई | 
उसके बाद स्वर्णा अपने बच्चो का ज्यादा ख़याल रखने लगी और संज्ञा के पुत्रो में कम ध्यान देने लगी | 

एक दिन संज्ञा के पुत्र शनिदेव को भूख लगी थी | तो उन्होंने स्वर्णा से भोजन माँगा | तब स्वर्णा ने कहा अभी ठहरो में भगवान् का भोग लगा लू | तुम्हारे भाई बहनो को खाना दे दू | फिर तुम्हे भोजन दूंगी | यह सुनकर शनि को क्रोध आ गया और उन्होंने माता को मारने के लिए पैर उठाया | तो स्वर्णा ने शनि को श्राप दिया की जिस पैर को मुझे मारने के लिए उठाया है वो पैर अभी के अभी टूट जाए | माता का यह श्राप सुनकर शनिदेव भयभीत होकर अपने पिता सूर्यदेव के पास गए और सब वृतान्त सुनाया | सूर्य देव तुरंत ही समझ गए की यह मेरी पत्नी नहीं हो सकती क्यों की कोई माँ अपने संतान को ऐसा नहीं कर सकती | तब सूर्यदेव ने क्रोध में आकर उन्हें पूछ बताओ तुम कौन हो ? सूर्य का तेज देखकर स्वर्णा गभरा गई और सारी सच्चाई उन्हें बतादि | तब सूर्यदेव ने शनि को समझाया की यह तुम्हारी माता नहीं है | लेकिन माँ समान है | इस लिए उनका दिया हुआ शाप व्यर्थ नहीं जायेगा | परन्तु इतना भी कठोर नहीं होगा की आपका पूरा पैर टूटेगा | तुम आजीवन एक पैर से लंगड़े चलते रहोगे | 


शनिदेव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है ? 
इस सम्बन्ध में आनंद कृत रामायण में कथा है | 
जब भगवान् श्रीराम ने सागरसेतु बाँध लिया | तब राक्षस इसे हानि ना पहुँचा सके | उसके लिए पवनसुत हनुमान को उसकी देखभाल रखने की जिम्मेदारी दी | जब हनुमानजी सायंकाल में भगवान् श्रीराम का ध्यान कर रहे थे | तभी सूर्यपुत्र शनि ने अपना काला कुरूप चेहरा बनाकर क्रोध से कहा-सुना है की तुम बहुत शक्तिशाली हो,बाहुबली हो अगर यह मैंने सही सुना है तो आओ मुझसे युद्ध करो | में देवताओ में सबसे शक्तिशाली देव शनिदेव हु | 
में तुमसे युद्ध कर के तुम्हे पराजित करूँगा | 
यह सुनकर हनुमानजी ने कहा इस समय में अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हु | आप उसमे विघ्न मत डालिये | और कृपा करके यहाँ से चले जाए | आप मेरे आदरणीय है | फिर भी शनि नहीं माने और हनुमानजी से युद्ध करने पर उतर आये | तब हनुमानजी ने अपनी पूंछ में शनि को लपेटना शुरू किया | बहुत जोर से लपेटना शुरू किया तब शनिदेव व्याकुल और पीड़ित होने लगे | हनुमानजी ने फिर सेतु की परिक्रमा करते हुए शनि के घमण्ड को तोड़ने के लिए शनिदेव को पत्थरो पर पटकना शुरू कर दिया | इससे शनि लुहलूहान होने लगे | जिससे उनकी पीड़ा बढ़ने लगी | तब शनिदेव ने हनुमानजी से प्रार्थना की मुझे बंधन से मुक्त करो | में अपराध की सजा भुगत चूका हु | में फिर से कभी भी ऐसी गलती नहीं करूँगा | 
फिर हनुमानजी ने कहा में तुम्हे तब ही छोडूंगा जब तुम मुझे वचन दोंगे की श्रीराम के भक्त को कभी भी परेशान नहीं करोगे | अगर तुमने ऐसा किया तो में कठोर दण्ड तुम्हे दूंगा | शनिदेव ने गिड़गिड़ाकर कहा में भूलकर भी आपके और श्रीराम के भकत को कष्ट नहीं दूंगा और नाही आपके या श्रीराम के भक्त की राशि पर कभी आऊंगा | आप मुझे अभी छोड़ दे | 
तब हनुमानजी ने छोड़ दिया शनिदेव को | फिर हनुमानजी से शनिदेव न अपने घावों की पीड़ा मिटाने के लिए तेल माँगा था | हनुमानजी ने जो तेल दिया था उसे घावों पर लगाते ही शनिदेव की पीड़ा मिट गई | उसी दिन से शनिवार को शनिदेव के ऊपर तेल चढ़ाया जाता है | ताकि उनकी पीड़ा और उनके द्वारा दिए गए कष्ट शांत हो जाए और वो प्रसन्न हो जाए | 

|| शनिदेव कथा समाप्तः || 



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