श्री स्तोत्रम् | Shree Stotram |

श्री स्तोत्रम् 

यह स्तोत्र बहुत ही अद्भुत है जो मनुष्यो को योग और भोग दोनों देता है | युद्ध में विजय प्राप्त कराता है | शत्रुबाधाओ से मुक्त करने में समर्थ  यह स्तोत्र | 
इस स्तोत्र को इन्द्र ने अपने साम्राज्य को स्थिरता और 
दैत्यों से बचने के लिए किया था | 
पुष्कर जी ने इस स्तोत्र को अग्निपुराण में भगवान् परशुराम को  बताया था | 
किसी भी दिन,किसी भी समय यह स्तोत्र का पाठ कर सकते है | 
श्री स्तोत्रम् | Shree Stotram |
श्री स्तोत्रम्

पुष्कर उवाच 
राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः | 
स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् || 
इन्द्र उवाच 
नमस्ते सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम् | 
श्रियमुन्निन्द्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ||
त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि | 
संध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती || 
यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या शोभने | 
आत्मविद्या देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी || 
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव | 
सौम्या  सौम्यं जगद्रूपं त्वयैतद्देवी पूरितम् || 
का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः | 
अध्यास्ते देवदेवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः || 
त्वया देवि परित्यक्तं सफलं भुवनत्रयम् |
विनष्टप्रायमभवत्वयेदानीं समेधिताम् || 
दाराः पुत्रस्तथाऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम् |
भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नॄणाम् || 
शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् |
देवि त्वददृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां दुर्लभम् || 
त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता | 
त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् || 
मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् |
मा शरीरं कलत्रं त्ययेथाः सर्वपावनि ||
मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशुन्मा विभूषणम् |
त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये || 
सत्येन समशौचाभ्यां तथा शिलादिभिर्गुणैः | 
त्यज्यन्ते नराः सद्यः सन्त्यक्ताः ये त्वयामले || 
त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शिलाद्यैरखिलैर्गुणैः | 
कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि || 
श्लाघ्यः सगुणी धन्यः सकुलीनः बुद्धिमान् | 
शूरः विक्रान्तो यस्त्वया देवी वीक्षितः || 
सद्योवैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः | 
पराङ्गमुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्ल्भे || 
ते वर्णयितुं शक्ता गुणज्जिह्वाऽपि वेधसः | 
प्रसीद देवि पद्माक्षि नास्माम्स्त्याक्षीः कदाचन || 
पुष्कर उवाच 
एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् | 
सुस्थिरत्वं राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् || 
स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् | 
श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च शृणुयान्नरः || 
|| श्रीस्तोत्र कथनं सम्पूर्णं ||  ( अग्निपुराण/अध्याय/२३७ )

श्री स्तोत्रम् | Shree Stotram | श्री स्तोत्रम् | Shree Stotram | Reviewed by karmkandbyanandpathak on 5:09 AM Rating: 5

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