किङ्किणी स्तोत्रं | Kinkini Stotram |


 किङ्किणी स्तोत्रं

 किङ्किणी स्तोत्रं | Kinkini Stotram |
Kinkini Stotram

नित्य पूजा के अंत में या किसी भी 
अनुष्ठान आदि के अंत में हाथो में पुष्प अक्षत लेकर यह पढ़ना चाहिए 

|| किङ्किणी स्तोत्रं || 

किं किं दुःखं सकल  जननि ! क्षीयते न स्मृतायाम् |
का का कीर्तिः कुल  कमलिनी प्राप्यते नार्चितायां || 1 || 

किं किं सौख्यं सुरवर नुते ! प्राप्यते न स्तुतायाम् | 
कं कं योगंत्वयि न तनुते चित्तमालम्बितायाम् || 2 ||

स्मृता भव - भय - ध्वंसि, पूजिताऽसि शुभङ्करि | 
स्तुता त्वं वाञ्छितां देवि ! ददासि करुणाकरे || 3  || 

परमानन्द  बोधाद्  विरुपे ! तेजः स्वरुपिणि, 
देव  वृन्द  शिरो  रत्न  निघृष्टचरणाम्बुजे ! 
चिद् विश्रान्ति महा सत्ता मात्रे मात्रे ! नमोऽस्तु ते || ३ || 

सृष्टि स्थित्युपसंहार  हेतु  भूते सनातनि ! 
गुण त्रयात्मिकाऽसि त्वं जगतः करणेच्छया || ४ || 

अनुग्रहाय भूतानां गृहीत  दिव्य  विग्रहे ! 
भक्तस्य मे नित्य  पूजा युक्तस्य परमेश्वरि || ५ || 

ऐहिकामुष्मिकी सिद्धिं देहि त्रिदश वन्दिते ! 
ताप त्रय  परिम्लान  भाजनं त्राहि मां शिवे || ६ || 

नान्यं वदामि न शृणोमि न चिन्तयामि | 
नान्यं स्मरामि न भजामि न चाश्रयामि |

त्यक्त्वा(त्वक्त्वा) त्वदीय चरणाम्बुजमादरेण | 
मां त्राहि देवि ! कृपया मयि देहि सिद्धिम् || 7 ||

अज्ञानाद् वा प्रमादाद् वा, वैकल्यात् साधनस्य च | 
यन्न्यूनमतिरिक्तं वा तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि || ८ || 

द्रव्य  हीनं क्रिया  हीनं श्रद्धा मन्त्र विवर्जितम् | 
तत्सर्वं कृपया देवि ! क्षमस्व त्वं दया निधे || ९ || 

यन्मया क्रियते कर्म तन्महत् स्वल्पमेव वा | 
तत्सर्वं च जगद्धात्रि ! क्षन्तव्यमयमज्जलिः || १० || 

|| इति श्री किङ्किणी स्तोत्रं  सम्पूर्णं || 
  

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